प्रार्थना

 मैं प्रलोभन देता हूँ।

उन शब्दों को;

जिन्हें प्रयुक्त करना चाहता हूँ,

मैं अपनी प्रार्थनाओं में ।

हर रोज युक्तियाँ लड़ाता हूँ कि 

अपनी आकांक्षा अनुसार जँचा पाऊँ कि 

आ जाये मेरे पक्ष में, और

जब मैं जाऊँ मंदिर ये बोल पड़े...

किन्तु! मंदिर जाते ही

विफल हो जाती हैं, युक्तियाँ,

कर जाते हैं, शब्द छल! और

हो जाती हैं, मेरी प्रार्थनाएँ मौन।

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