संदेश

विजयदशमी

 आज निशा में  अग्नि चूमेगी आकाश को लपटें उठेंगी प्रचण्ड हो.. कोई रावण , कोई राम प्रकृति के इस चक्र में बौना ही जान पड़ेगा! रश्मियां चमकेगी यों  की होगा ऊर्जा का संचार; किंतु जिनमें ऊर्जा का उत्साह,  उन्मत्तता की ओर झुक जायेगा... उनसे वह “प्रकृति” का बोध छूट जायेगा।

वेदना

 वेदना सदा अकेली रही; सुनसान और बंजर सी । वेदना की हूक सदा दबी रही जो व्यक्त न हो पाई। वेदना लिखी भी गई; लेखकों ने अनेक रूपों में  लेकिन कभी न पाई ठोर ठिकाना, ज्यों त्यक्त स्त्री न पाई..। सच है! वेदना शब्दों से कहाँ व्यक्त हो पाई... फिर भी यह क़लम ज़िद्दी है; कुछ न कुछ लिखने  की मूढ़ता मुझसे करवायेगी ही... वेदना; ज्यों गोकुल छोड़ गया कृष्ण। वेदना, ज्यों अयोध्या छोड़ गया राम। वेदना, ज्यों अग्नि में बैठ गया प्रहलाद। वेदना, ज्यों बाणों की शैय्या  पर लेट गया भीष्म...।

जीव

जीव का आधार अध्यात्म है; जिस प्रकार ध्यान का आधार ध्येय है। अध्यात्म अनुमान का विषय नहीं है; यह दृश्य और दुष्टा का विषय है। जिस प्रकार अंधेरे में पड़ी रस्सी सर्प लगती है, वही प्रकाश उसका असली रूप दिखता है।  अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ता ही अध्यात्म है। इन्द्रियां जो विषयों के अधीन है;उन्हें वासना से विवेक की और ले जाकर सहज निष्कामता की और बढ़ना ही जीवन है।  जब इंद्रियां अपने विषयों का अनुभव करती है। उस समय होश में रहकर उनका अनुभव करना विवेक है और उनका बेहोश अनुभव करना वासना है।  उदाहरण; विवेकानंद से पूछा गया था क्या आपको कामुकता परेशान करती है - हां, परेशान करती है लेकिन जब कामुकता मेरे द्वार पर आती है तो मैं दरवाजा नहीं खोलता। मैं क्या हूँ! जैसे प्रश्न अस्तित्व हीनता का भाव दर्शाती है। इस भाव का त्याग कर, इस सृष्टि से प्राप्त हुए ज्ञान से इस सृष्टि की बेहतरी के लिए अपनी योग्यता अनुसार कार्य करता है। तब मैं क्या हूँ! जैसे सवाल महत्व हीन हो जाते हैं। फिर भी वेदांत अनुसार; जीव का ब्रह्म /प्रकृति/ आत्मा में विलीन हो जाना है  अ र्थात हम शून्य है।

एंट्री & एग्जिट

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 एक हवेली  आकर्षण का केंद्र बनी है; आज उसमें एंट्री खुली है,   क़तार लम्बी लग गई है। हवेली का देख आंतरिक वैभव सबकी आँखें चौंधियाँ गई है। बनाने वाले की नज़रों में  कोई स्वागत योग्य नहीं है! सबको एक तराज़ू में तौलकर  एग्जिट दिया जा रहा है। एक बहुत बड़ा समूह रोते बिलखते निकला,   एक समूह चुपचाप, मायूस हो निकला और  एक न निकलने की ढीठाई कर रहा था। भूल गये!ठहर जाने की व्यवस्था नहीं है। एंट्री और एग्जिट निश्चित है; इस मध्य जो हुआ, वह केवल! खेल खिलौना मात्र था।

जीवन

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 रोज सूरज की किरण आती है  और लौट जाती है निराश होकर; देख उन बंद पर्दों ढकी खिड़कियों को । ये आजाद से दिखने वाले कैदी, बन गये हैं कृत्रिमता के दास; केवल इन्होंने देखा है, प्रकृति का सरल रूप; भोग रहे हैं भरपूर, इनके पेट गये हैं फूल, अवगुण बना लिये हैं कूल... जब प्रकृति दिखायेगी अपना वीभत्स रूप! तब इनके पेट जायेंगे फूट  शैय्या पर उग आयेंगे शूल  जब निकलने लगेगा खून  तब उठेंगे लहुलुहान हालत में  और हटेंगे पर्दें खुलेगी खिड़कियाँ; हो जायेंगे सारे आजाद मानवीय गुण और मनायेंगे सब मिलकर उत्सव। उत्सव की आभा में खिल उठेंगे फूल  और महक उठेगा सारा संसार...।

प्रार्थना

 मैं प्रलोभन देता हूँ। उन शब्दों को; जिन्हें प्रयुक्त करना चाहता हूँ, मैं अपनी प्रार्थनाओं में । हर रोज युक्तियाँ लड़ाता हूँ कि  अपनी आकांक्षा अनुसार जँचा पाऊँ कि  आ जाये मेरे पक्ष में, और जब मैं जाऊँ मंदिर ये बोल पड़े... किन्तु! मंदिर जाते ही विफल हो जाती हैं, युक्तियाँ, कर जाते हैं, शब्द छल! और हो जाती हैं, मेरी प्रार्थनाएँ मौन।

दिसंबर

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