संदेश

सितंबर, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ध्यान

चित्र
 किसका धरू ध्यान; पंचतत्वों का, त्रिगुणों का, और इन चारों दिशाओं का, या चुनूँ कोई मध्यस्थता! किंतु! मध्यस्थता क्यूँ ? मैं कोई विवाद हूँ ! ध्यान का मूल केंद्र है प्राण, जिसका स्त्रोत है, हमारी चेतना। ये विवाद तो है, बुद्धि का खेल, जिसका स्त्रोत है, केवल माया। चुनाव हमारा; माया या चेतना। माया का ध्यान सुख देगा, चेतना का ध्यान आनंद...।

विसर्जन

चित्र
हाँ, श्रेष्ठता नहीं कोई मुझमें! किंतु! स्वयं को नीचा कहना; अपमान है, “ब्रह्म स्वरूपता” का..। जब मान सम्मान बढ़ाने का ध्येय रख  कोई रचना रचता हूँ; मैं “वेदव्यास” और  “गणेश” हो जाते हैं मेरी तूलिका। किंतु! प्रकृति के अधीनस्थ हूँ; थोड़ा मोह रखता हूँ, हाँ, मैं “विसर्जन” से बचता हूँ!