ध्यान
किसका धरू ध्यान;
पंचतत्वों का, त्रिगुणों का,
और इन चारों दिशाओं का,
या चुनूँ कोई मध्यस्थता!
किंतु! मध्यस्थता क्यूँ ?
मैं कोई विवाद हूँ !
ध्यान का मूल केंद्र है प्राण,
जिसका स्त्रोत है, हमारी चेतना।
ये विवाद तो है, बुद्धि का खेल,
जिसका स्त्रोत है, केवल माया।
चुनाव हमारा;
माया या चेतना।
माया का ध्यान सुख देगा,
चेतना का ध्यान आनंद...।

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