प्रेमी
मैं वही ठहरा हुआ हूँ, जहाँ तुम छोड़ कर गए थे। मैं बग़ीचे में आज भी घंटों तुम्हारी याद में बिता देता हूँ। हाँ, उसी बग़ीचे में जहाँ हमने मिलकर फुलवारी लगाई थी। तुम्हारे जाने के बाद आज भी उस फुलवारी की संभाल करता हूँ ; उन फूलों के रंग के आलावा कोई रंग नहीं बचा है, मेरे जीवन में..! जब तुम आए थे, सबसे मिल कर हर पुरानी याद ताज़ा कर चले गए। हम जहाँ अक़्सर जाया करते थे, मैं उसी नहर के पास था और तुम अनजान की तरह वहाँ से गुजर गए। तुम साथ थे मैं बहता पानी था, अब थम सा गया हूँ! हाँ, भुला नहीं तुम मर्यादाओं के बहुत पक्के हो.. तुम्हारी मर्यादा पर आँच नहीं आती, अगर तुम उस फुलवारी को छू भर जाते, मैं उससे ही जान लेता तुम्हारा हाल ए दिल और तुम मेरा जान पाते...! हम समुंदर के अलग-अलग टापू से हो गए हैं, जो रहते है तटस्थ, स्वीकार अपनी प्रकृति। जिनका क़रीब आना संभव नहीं है। कम से कम संतुष्टि इस बात है, कि समुंदर तो एक ही है, हमा रे लिए इतना काफ़ी है।