स्व
गिर गया है!
तो उठ जा..।
क्या देख रहा है ?
कोई हाथ नहीं आयेगा,
खुद ही उठना पड़ेगा..।
तुम्हें स्वयं ही वो हाथ बनना पड़ेगा
जिसे पकड़, उठना है।
हम स्वयं गुरु भी हैं, शिष्य भी हैं।
जब उठ रहे थे, तब गुरु..
गिर रहे थे, तब शिष्य हुये।
यह चक्र जीवन में आता रहेगा।
जीवन यात्रा है , इसे तय कीजिये..।
इस यात्रा में जो मिल जाये, ठीक-ठाक है,
कुछ हासिल करना केवल भ्रम मात्र है।
लग रहा होगा यह कोरी कल्पना मात्र है!
किंतु ! कल्पना से हम विकसित होते हैं।
ध्यान रहे! कल्पना का अनुपात यथार्थता से अधिक न हो जाये।
अगर स्वयं को अतीत से तौलते रहे,
तो जकड़ लिए जाओगे उसके द्वारा!
प्राण लगने लगेगा जैसे कोई कर्जा!
और तुम पड़ जाओगे जीते जी ठंडे।
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