भटकाव
दिल और दिमाग़ में कुछ तो है विशेष,
जो दोनों में रखता है सदा क्लेश।
किंतु! इनकी विशेषता से अधिक
मैं यह जानना चाहता हूँ;
इन दोनों के बीच मेरा क्या स्थान है,
दिल और दिमाग़ के बीच! मैं कहाँ हूँ ?
कहते है, मंथन से हल मिलता है;
समुद्र मंथन से बहुत कुछ मिला था।
किंतु! यह भीतरी मंथन;
देता है, केवल भटकाव!
हां, केवल भटकाव...।
शायद, मानव जीवन की नियति भटकाव ही है।
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