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कृष्ण

 तेरा ये संसार बहुत बड़ा, मैं यहाँ केवल रत्ती भर सा। तू यहाँ बहुत खेल है रचता, तुझे जाने कोई ही विरला। तू कभी कुछ ऐसा है दिखाता कि बढ़ जाती नास्तिकता, कभी कुछ ऐसा दिखाता, कि बढ़ जाती आस्तिकता। तू सर्वकला में निपुण होकर भी सांसारिकता को निमित्त है बनाता। ऐसी आधीनी मुझमें कहाँ! तेरी विराटता कौन माप पाता। मुझमें,तुझमें एक रही समानता; तू भी काल के आधीन, मैं भी काल के आधीन! तेरा सा साथी, प्रेमी कौन हो पाता!

चुनाव

 मुश्किल है तो क्या,  पार तो पाना होगा। मंजिल नहीं तो क्या, चलते तो रहना होगा। नदी पहाड़ से गिरती है: कहाँ कुछ तय करती है, किस बाधा से पाला पड़ेगा! वह अविरल बहती है  और जमीनें उपजाऊ करती है। हमारा ठहर जाना सरल है; किंतु ! उसके परिणाम: असंतुष्टि भरे होंगे, जो हमारे मानस को कचोटेगा । चुनना ही है, तो चलते रहना ही चुन लेंगे। परिणाम! सफलता ना सही किंतु संतुष्टि भरे होंगे, जो मानस पीड़ा से बचायेंगे।

वीणावादिनी

 कैसे संयोग हुये: स्याही रिक्त हुई, कलम रुक गई, शब्दों ने धुन बजाई, आकाश में गुंजन हुई...। कोई वीणावादिनी  यहाँ प्रकट हुई..! मेरी चेतना बेसुध हुई! छाया अंतस में  एक कोरा पन और इंद्रियाँ शांत हुई। किंतु! वृत्ति बाध्य थी, होने को हावी..! सारे संयोग क्षणिक थे! और वीणावादिनी गायब थी।

शूल

हुआ क्या ये करामात ; पहाड़ के नीचे की ज़मीन पर कोई उगा दिया रंग बिरंगे फूल। पहाड़ों पर बादलों के पास  प्रकृति के संरक्षण में,  थी एक चंचला; शक्ति से भरपूर। देख उन फूलों की आब हो गई मुग्ध, खो बैठी सुध बुध। कर शक्ति का दुरुपयोग बना बादलों की सीढ़ी  उतर आई दामन पर उसके पाँव रखते ही फूल  बन गए शूल..! सीढ़ी गई टूट! और गिर पड़ी वह ज़मीन पर  गिरते ही दबोच ली गई, नोच ली गई ; ख़ूब चीखीं चिल्लाई पर सुनने वाला कौन ? जंगल तो रहता सदा मौन..! प्रकृति थी मजबूर, चुनाव का फल देती ज़रूर ।

कसक

हैं पतझड़ अनेकों यहां, जो बुला रहे बसंत यहां। जड़! चेतन हो रहा, अबोल! बोल रहा। मानों हो रहा कोई गायन यहां। गगन! बजा रहा कोई वाद्य यंत्र.. शब्दों ने सीख ली कोई नृत्य कला, और क़लम हो गई नटराज यहां..! ये हो रहा कैसा संयोग! मृग पा गया हो कस्तूरी,केसर  और मरू से मिल गई हो कोई नहर। किसकी पीड़ा में थी इतनी कसक कि उतर आई प्रकृति मनाने उत्सव..! नमन हो उस पीड़ा को , मृगतृष्णा को। हो नमन उस क़लम को , उन शब्दों को। नमन हो उस अबोल को, जड़ को। हो नमन उस पतझड़ को, नमन हो, नमन हो...