कृष्ण

 तेरा ये संसार बहुत बड़ा,

मैं यहाँ केवल रत्ती भर सा।

तू यहाँ बहुत खेल है रचता,

तुझे जाने कोई ही विरला।


तू कभी कुछ ऐसा है दिखाता

कि बढ़ जाती नास्तिकता,

कभी कुछ ऐसा दिखाता,

कि बढ़ जाती आस्तिकता।


तू सर्वकला में निपुण होकर भी

सांसारिकता को निमित्त है बनाता।

ऐसी आधीनी मुझमें कहाँ!

तेरी विराटता कौन माप पाता।


मुझमें,तुझमें एक रही समानता;

तू भी काल के आधीन,

मैं भी काल के आधीन!

तेरा सा साथी, प्रेमी कौन हो पाता!

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जीव

एंट्री & एग्जिट

भटकाव