शूल

हुआ क्या ये करामात ;

पहाड़ के नीचे की ज़मीन पर

कोई उगा दिया रंग बिरंगे फूल।

पहाड़ों पर बादलों के पास 

प्रकृति के संरक्षण में, 

थी एक चंचला;

शक्ति से भरपूर।

देख उन फूलों की आब

हो गई मुग्ध,

खो बैठी सुध बुध।

कर शक्ति का दुरुपयोग

बना बादलों की सीढ़ी 

उतर आई दामन पर

उसके पाँव रखते ही फूल 

बन गए शूल..! सीढ़ी गई टूट!

और गिर पड़ी वह ज़मीन पर 

गिरते ही दबोच ली गई, नोच ली गई ;

ख़ूब चीखीं चिल्लाई पर सुनने वाला कौन ?

जंगल तो रहता सदा मौन..!

प्रकृति थी मजबूर,

चुनाव का फल देती ज़रूर ।

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