चुनाव

 मुश्किल है तो क्या, 

पार तो पाना होगा।

मंजिल नहीं तो क्या,

चलते तो रहना होगा।


नदी पहाड़ से गिरती है:

कहाँ कुछ तय करती है,

किस बाधा से पाला पड़ेगा!

वह अविरल बहती है 

और जमीनें उपजाऊ करती है।


हमारा ठहर जाना सरल है;

किंतु ! उसके परिणाम:

असंतुष्टि भरे होंगे,

जो हमारे मानस को कचोटेगा ।


चुनना ही है,

तो चलते रहना ही चुन लेंगे।

परिणाम! सफलता ना सही

किंतु संतुष्टि भरे होंगे,

जो मानस पीड़ा से बचायेंगे।

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