विसर्जन

हाँ, श्रेष्ठता नहीं कोई मुझमें!

किंतु! स्वयं को नीचा कहना;

अपमान है, “ब्रह्म स्वरूपता” का..।

जब मान सम्मान बढ़ाने का ध्येय रख 

कोई रचना रचता हूँ;

मैं “वेदव्यास” और 

“गणेश” हो जाते हैं मेरी तूलिका।

किंतु! प्रकृति के अधीनस्थ हूँ;

थोड़ा मोह रखता हूँ,

हाँ, मैं “विसर्जन” से बचता हूँ!



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