जीवन
रोज सूरज की किरण आती है
और लौट जाती है निराश होकर;
देख उन बंद पर्दों ढकी खिड़कियों को ।
ये आजाद से दिखने वाले कैदी,
बन गये हैं कृत्रिमता के दास;
केवल इन्होंने देखा है,
प्रकृति का सरल रूप;
भोग रहे हैं भरपूर,
इनके पेट गये हैं फूल,
अवगुण बना लिये हैं कूल...
जब प्रकृति दिखायेगी अपना वीभत्स रूप!
तब इनके पेट जायेंगे फूट
शैय्या पर उग आयेंगे शूल
जब निकलने लगेगा खून
तब उठेंगे लहुलुहान हालत में
और हटेंगे पर्दें खुलेगी खिड़कियाँ;
हो जायेंगे सारे आजाद मानवीय गुण
और मनायेंगे सब मिलकर उत्सव।
उत्सव की आभा में खिल उठेंगे फूल
और महक उठेगा सारा संसार...।

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