दिल और दिमाग़ में कुछ तो है विशेष, जो दोनों में रखता है सदा क्लेश। किंतु! इनकी विशेषता से अधिक मैं यह जानना चाहता हूँ; इन दोनों के बीच मेरा क्या स्थान है, दिल और दिमाग़ के बीच! मैं कहाँ हूँ ? कहते है, मंथन से हल मिलता है; समुद्र मंथन से बहुत कुछ मिला था। किंतु! यह भीतरी मंथन; देता है, केवल भटकाव! हां, केवल भटकाव...। शायद, मानव जीवन की नियति भटकाव ही है।
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