वीणावादिनी

 कैसे संयोग हुये:

स्याही रिक्त हुई,

कलम रुक गई,

शब्दों ने धुन बजाई,

आकाश में गुंजन हुई...।

कोई वीणावादिनी 

यहाँ प्रकट हुई..!

मेरी चेतना बेसुध हुई!

छाया अंतस में 

एक कोरा पन और

इंद्रियाँ शांत हुई।

किंतु!

वृत्ति बाध्य थी,

होने को हावी..!

सारे संयोग क्षणिक थे!

और वीणावादिनी गायब थी।

टिप्पणियाँ

  1. क्षणिकता ही परिवर्तन है और परिवर्तन ही सच्चाई है सच्चाई ही साधन और साधन ही मजबूती देता है और मजबूती ही आवश्यक है और आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है और जननी ही वात्सल्य है और वात्सल्य ही सबको चाहिए क्योंकि सब खुश र ना चाहते हैं दुख भरे संसार में

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