कसक

हैं पतझड़ अनेकों यहां,
जो बुला रहे बसंत यहां।
जड़! चेतन हो रहा,
अबोल! बोल रहा।
मानों हो रहा कोई गायन यहां।
गगन! बजा रहा कोई वाद्य यंत्र..
शब्दों ने सीख ली कोई नृत्य कला,
और क़लम हो गई नटराज यहां..!

ये हो रहा कैसा संयोग!
मृग पा गया हो कस्तूरी,केसर 
और मरू से मिल गई हो कोई नहर।
किसकी पीड़ा में थी इतनी कसक
कि उतर आई प्रकृति मनाने उत्सव..!

नमन हो उस पीड़ा को , मृगतृष्णा को।
हो नमन उस क़लम को , उन शब्दों को।
नमन हो उस अबोल को, जड़ को।
हो नमन उस पतझड़ को, नमन हो, नमन हो...

टिप्पणियाँ

  1. बहुत ख़ूब मास्टरजी।
    साधुवाद है आपको।
    (सोमदत्त, देहरादून)
    🙏🇮🇳🌹🌷💐

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