दुलार

 कई बार पेड़ों की छाँव वो अहसास करा देते हैं,

जो माँ का पल्लू सर पर होता था...

हाँ, वही पल्लू !

जिससे माँ हमें धूप से बचाया करती थी,

हाँ ,वही धूप!

जिसमें लुका छिपी खेला करते थे।

हाँ, वही खेल 

जिसे खेलकर खुशी आ जाती थी।

हाँ, वही खुशी!

जब पिता मेले जाने को राजी हो जाते थे।

हाँ, वही मेला!

जिसमें खिलौनें और मिठाइयाँ होती थी।

हाँ, वही खिलौना, मिठाई !

जिसके लिए हम जिद्द करते थे।

हाँ, वही जिद्द!

जिसमें मार भी पड़ जाया करती थी।

हाँ, वहीं मार!

जिसमें हम रोते थे।

हाँ, वही रोना!

जिसमें माँ दुलार करती थी।

हाँ, वही दुलार !

जिसे हम रह रहकर याद करते हैं...!

टिप्पणियाँ

  1. बहुत ख़ूब मास्टरजी।
    बचपन की यादें ताज़ा हो गईं।
    साधुवाद है आपको।
    (सोमदत्त, देहरादून)

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