कर्म

 भोर हो गई है।

हम विश्राम करके उठे हैं।

सूर्य की गति से हमारे काज होते हैं,

यही हमारी ऊर्जा का स्त्रोत है‌।

इसके लिए सदा विनयशील रहिये।

जिस प्रकृति प्रदत्त शरीर का 

हम भरपूर उपयोग कर रहे हैं, 

यह एक अवस्था आने पर 

व्याधियों से घिर जायेगा,

तब शून्यता का अहसास करायेगा।

उस समय हमारी बुद्धि में चलचित्र की भांति 

संचित कर्म दिखाई पड़ेंगे !

हम स्वयं को कर्मों के सामने बहुत न्यून पायेंगे ।यही न्यूनता हमें ज्ञात करायेगी

 कि कोनसी आकांक्षाएँ

साध्य योग्य है , कौनसी नहीं!  

अंततः हम संयमित होना सीख जायेंगे।

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