जीव का आधार अध्यात्म है; जिस प्रकार ध्यान का आधार ध्येय है। अध्यात्म अनुमान का विषय नहीं है; यह दृश्य और दुष्टा का विषय है। जिस प्रकार अंधेरे में पड़ी रस्सी सर्प लगती है, वही प्रकाश उसका असली रूप दिखता है। अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ता ही अध्यात्म है। इन्द्रियां जो विषयों के अधीन है;उन्हें वासना से विवेक की और ले जाकर सहज निष्कामता की और बढ़ना ही जीवन है। जब इंद्रियां अपने विषयों का अनुभव करती है। उस समय होश में रहकर उनका अनुभव करना विवेक है और उनका बेहोश अनुभव करना वासना है। उदाहरण; विवेकानंद से पूछा गया था क्या आपको कामुकता परेशान करती है - हां, परेशान करती है लेकिन जब कामुकता मेरे द्वार पर आती है तो मैं दरवाजा नहीं खोलता। मैं क्या हूँ! जैसे प्रश्न अस्तित्व हीनता का भाव दर्शाती है। इस भाव का त्याग कर, इस सृष्टि से प्राप्त हुए ज्ञान से इस सृष्टि की बेहतरी के लिए अपनी योग्यता अनुसार कार्य करता है। तब मैं क्या हूँ! जैसे सवाल महत्व हीन हो जाते हैं। फिर भी वेदांत अनुसार; जीव का ब्रह्म /प्रकृति/ आत्मा में विलीन हो जाना है अ र्थात हम शून्य है।
एक हवेली आकर्षण का केंद्र बनी है; आज उसमें एंट्री खुली है, क़तार लम्बी लग गई है। हवेली का देख आंतरिक वैभव सबकी आँखें चौंधियाँ गई है। बनाने वाले की नज़रों में कोई स्वागत योग्य नहीं है! सबको एक तराज़ू में तौलकर एग्जिट दिया जा रहा है। एक बहुत बड़ा समूह रोते बिलखते निकला, एक समूह चुपचाप, मायूस हो निकला और एक न निकलने की ढीठाई कर रहा था। भूल गये!ठहर जाने की व्यवस्था नहीं है। एंट्री और एग्जिट निश्चित है; इस मध्य जो हुआ, वह केवल! खेल खिलौना मात्र था।
दिल और दिमाग़ में कुछ तो है विशेष, जो दोनों में रखता है सदा क्लेश। किंतु! इनकी विशेषता से अधिक मैं यह जानना चाहता हूँ; इन दोनों के बीच मेरा क्या स्थान है, दिल और दिमाग़ के बीच! मैं कहाँ हूँ ? कहते है, मंथन से हल मिलता है; समुद्र मंथन से बहुत कुछ मिला था। किंतु! यह भीतरी मंथन; देता है, केवल भटकाव! हां, केवल भटकाव...। शायद, मानव जीवन की नियति भटकाव ही है।
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