जुगनू

कुछ टूटे हैं सपने

कुछ छूटे हैं अपने 

जो डोर बांधे हुए थे,

ढूंढ़ रहा हूँ...

ना जाने कब से ?


रौशनी की चाहत लिए,

लड़ रहा हूँ, अंधकार से!

रातें जाया कर रहा हूँ

खुदा ही जाने किस 

जुगनू की तलाश में...

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