ये तृष्णा की नदी तो गहरी होती जा रही है। कही ये डूबा ना ले जाए मुझे! कही हाथ पैर मारता ना रह जाऊँ..। यहाँ कोई नाविक दिखाई नहीं दे रहा..! परंतु यह बाह्य दृष्टि तो क्या ही सहायता करेगी! और यह डूबने का भय अंतर्दृष्टि नहीं खुलने देगी। मध्य में ठहर जाऊँ...? क्या इस नदी में आते वेग को सह पाऊँगा ? इतनी शक्ति इस देह में कहाँ ? यह शक्ति भी तो एक नहीं! आसुरी और दैवीय है। कौनसी शक्ति किस अनुपात में होगी मुझमें ? कही आसुरी अधिक हुई..! मेरा शुभ नाश कर जायेगी! कोई मध्य मार्ग निकालूँ या भूल जाऊँ ? यूँ प्रश्नों के जाल में फँसने वाले जिज्ञासु कहाँ बच पाये हैं। भूल ही जा दिवास्वप्न मानकर! हाँ,भूलना पड़ेगा..! ये पेट भूखा जो है! कभी-कभी तो आसान लगता है, सब त्याग देना कर्तव्य निर्वहन के आगे..।
कभी तो लिखूँगा मैं वो पीड़ाएँ जो कभी लिखी नहीं गई! जो छोड़ दी गई कहकर अयोग्य, महत्त्वहीन, समय की बरबादी, अविवेचनीय। उस पुरुष की पीड़ा लिखना कठिन है, जो बैठ गया त्रिताप से, होकर आश्रित! जाने अनजाने उसके अपने भी चोट कर जाते हैं जिनके लिए वो उपयोगी था। स्वार्थ और लाभ का असली मतलब उसने ही जाना होगा ? जाना होगा एकांत व अकेलेपन के महीन अंतर! दिया होगा अपने अपमानों का उसने मौन प्रत्युत्तर। अरे अमित अभिशप्त हैं वे पुरुष जो इस “नाशवान” लोक में अनुपयोगी है! कभी तो लिखूँगा मैं वो पीड़ाएँ जो क़ैद कर ली गई बिना किसी अपराध के! जैसे सजा मुकर्रर करने के बाद न्यायाधीश तोड़ देता है क़लम..।
मसिपात्र है, तुलिका तैयार है। शब्द आतुर हैं कागज पर उतरने को; किंतु, मैं भय में हूँ! शब्द जो चित्र खींचेंगे उसकी कल्पनामात्र से कांप रहा हूँ। श्वेत कागज मुझे रक्त रंजित युद्ध भूमि दिखाई दे रहा है। जो ज्वार मेरे भीतर है, वह मौन की दीवार से रुका हुआ है; दीवार कितना भार वहन कर पायेगी और अगर टूटी - क्या क्या मूल्यवान नष्ट कर जायेगी....मेरे पास उत्तर नहीं। सुना है- नाश के दुख से कभी दबता नहीं निर्माण का सुख; मैं नाश के दुख को सहन कर पाऊंगा...मेरे पास उत्तर नहीं।
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