मनभेद

परेशान हूँ! शब्दों से
बार बार आ जाते हैं।
ज़िद्द करते हैं,लिखो हमें!
उतारो कविता में।

मैं बहस करता हूँ, इनसे!
स्वच्छंद रहो,
अपने अपने रूप में ही रहो..
जुड़कर नया रूप क्यों लेते हो?

हम इंसानों से सीखो!
हमारे आपसी मनभेद 
लील गए सौहार्द को!
फिर भी 
जुड़ते नहीं, कुछ भी हो।

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