वेदना सदा अकेली रही; सुनसान और बंजर सी । वेदना की हूक सदा दबी रही जो व्यक्त न हो पाई। वेदना लिखी भी गई; लेखकों ने अनेक रूपों में लेकिन कभी न पाई ठोर ठिकाना, ज्यों त्यक्त स्त्री न पाई..। सच है! वेदना शब्दों से कहाँ व्यक्त हो पाई... फिर भी यह क़लम ज़िद्दी है; कुछ न कुछ लिखने की मूढ़ता मुझसे करवायेगी ही... वेदना; ज्यों गोकुल छोड़ गया कृष्ण। वेदना, ज्यों अयोध्या छोड़ गया राम। वेदना, ज्यों अग्नि में बैठ गया प्रहलाद। वेदना, ज्यों बाणों की शैय्या पर लेट गया भीष्म...।
जीव का आधार अध्यात्म है; जिस प्रकार ध्यान का आधार ध्येय है। अध्यात्म अनुमान का विषय नहीं है; यह दृश्य और दुष्टा का विषय है। जिस प्रकार अंधेरे में पड़ी रस्सी सर्प लगती है, वही प्रकाश उसका असली रूप दिखता है। अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ता ही अध्यात्म है। इन्द्रियां जो विषयों के अधीन है;उन्हें वासना से विवेक की और ले जाकर सहज निष्कामता की और बढ़ना ही जीवन है। जब इंद्रियां अपने विषयों का अनुभव करती है। उस समय होश में रहकर उनका अनुभव करना विवेक है और उनका बेहोश अनुभव करना वासना है। उदाहरण; विवेकानंद से पूछा गया था क्या आपको कामुकता परेशान करती है - हां, परेशान करती है लेकिन जब कामुकता मेरे द्वार पर आती है तो मैं दरवाजा नहीं खोलता। मैं क्या हूँ! जैसे प्रश्न अस्तित्व हीनता का भाव दर्शाती है। इस भाव का त्याग कर, इस सृष्टि से प्राप्त हुए ज्ञान से इस सृष्टि की बेहतरी के लिए अपनी योग्यता अनुसार कार्य करता है। तब मैं क्या हूँ! जैसे सवाल महत्व हीन हो जाते हैं। फिर भी वेदांत अनुसार; जीव का ब्रह्म /प्रकृति/ आत्मा में विलीन हो जाना है अ र्थात हम शून्य है।
ये तृष्णा की नदी तो गहरी होती जा रही है। कही ये डूबा ना ले जाए मुझे! कही हाथ पैर मारता ना रह जाऊँ..। यहाँ कोई नाविक दिखाई नहीं दे रहा..! परंतु यह बाह्य दृष्टि तो क्या ही सहायता करेगी! और यह डूबने का भय अंतर्दृष्टि नहीं खुलने देगी। मध्य में ठहर जाऊँ...? क्या इस नदी में आते वेग को सह पाऊँगा ? इतनी शक्ति इस देह में कहाँ ? यह शक्ति भी तो एक नहीं! आसुरी और दैवीय है। कौनसी शक्ति किस अनुपात में होगी मुझमें ? कही आसुरी अधिक हुई..! मेरा शुभ नाश कर जायेगी! कोई मध्य मार्ग निकालूँ या भूल जाऊँ ? यूँ प्रश्नों के जाल में फँसने वाले जिज्ञासु कहाँ बच पाये हैं। भूल ही जा दिवास्वप्न मानकर! हाँ,भूलना पड़ेगा..! ये पेट भूखा जो है! कभी-कभी तो आसान लगता है, सब त्याग देना कर्तव्य निर्वहन के आगे..।
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