वेदना

 वेदना सदा अकेली रही;

सुनसान और बंजर सी ।

वेदना की हूक सदा दबी रही

जो व्यक्त न हो पाई।


वेदना लिखी भी गई;

लेखकों ने अनेक रूपों में 

लेकिन कभी न पाई

ठोर ठिकाना,

ज्यों त्यक्त स्त्री न पाई..।


सच है! वेदना शब्दों से कहाँ व्यक्त हो पाई...


फिर भी यह क़लम ज़िद्दी है;

कुछ न कुछ लिखने 

की मूढ़ता मुझसे करवायेगी ही...

वेदना;

ज्यों गोकुल छोड़ गया कृष्ण।

वेदना,

ज्यों अयोध्या छोड़ गया राम।

वेदना,

ज्यों अग्नि में बैठ गया प्रहलाद।

वेदना,

ज्यों बाणों की शैय्या

 पर लेट गया भीष्म...।

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