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जीवन

चित्र
 रोज सूरज की किरण आती है  और लौट जाती है निराश होकर; देख उन बंद पर्दों ढकी खिड़कियों को । ये आजाद से दिखने वाले कैदी, बन गये हैं कृत्रिमता के दास; केवल इन्होंने देखा है, प्रकृति का सरल रूप; भोग रहे हैं भरपूर, इनके पेट गये हैं फूल, अवगुण बना लिये हैं कूल... जब प्रकृति दिखायेगी अपना वीभत्स रूप! तब इनके पेट जायेंगे फूट  शैय्या पर उग आयेंगे शूल  जब निकलने लगेगा खून  तब उठेंगे लहुलुहान हालत में  और हटेंगे पर्दें खुलेगी खिड़कियाँ; हो जायेंगे सारे आजाद मानवीय गुण और मनायेंगे सब मिलकर उत्सव। उत्सव की आभा में खिल उठेंगे फूल  और महक उठेगा सारा संसार...।

प्रार्थना

 मैं प्रलोभन देता हूँ। उन शब्दों को; जिन्हें प्रयुक्त करना चाहता हूँ, मैं अपनी प्रार्थनाओं में । हर रोज युक्तियाँ लड़ाता हूँ कि  अपनी आकांक्षा अनुसार जँचा पाऊँ कि  आ जाये मेरे पक्ष में, और जब मैं जाऊँ मंदिर ये बोल पड़े... किन्तु! मंदिर जाते ही विफल हो जाती हैं, युक्तियाँ, कर जाते हैं, शब्द छल! और हो जाती हैं, मेरी प्रार्थनाएँ मौन।