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भटकाव

दिल और दिमाग़ में कुछ तो है विशेष, जो दोनों में रखता है सदा क्लेश। किंतु! इनकी विशेषता से अधिक  मैं यह जानना चाहता हूँ; इन दोनों के बीच मेरा क्या स्थान है, दिल और दिमाग़ के बीच! मैं कहाँ हूँ ? कहते है, मंथन से हल मिलता है; समुद्र मंथन से बहुत कुछ मिला था। किंतु! यह भीतरी मंथन; देता है, केवल भटकाव!  हां, केवल भटकाव...। शायद, मानव जीवन की नियति भटकाव ही है।

प्रेम

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 हे शक्ति मुझे दो देवत्व; कि आकर्षणों में डूबे हुये प्रेमियों को  मिल जाये उन्हें अपना देवता और  हो उन्हें दर्शन मुझसे! प्रत्यक्ष प्रेम का। या मुझे दो ऐसी विद्वता; कि ये जिस आकर्षण को प्रेम का नाम दिये हुये हैं, जान ले वह है केवल कल्पना मात्र, और खुल जाये इनके नेत्र ।  या मुझे दो नया पाखंड;  कि जो प्रेम की परिभाषा चली आई है.. उसी परिभाषा की अग्नि में  घी डालकर अग्नि और प्रज्वलित कर  अगली पीढ़ी को भी इसमें झोंक लूं।