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दुलार

 कई बार पेड़ों की छाँव वो अहसास करा देते हैं, जो माँ का पल्लू सर पर होता था... हाँ, वही पल्लू ! जिससे माँ हमें धूप से बचाया करती थी, हाँ ,वही धूप! जिसमें लुका छिपी खेला करते थे। हाँ, वही खेल  जिसे खेलकर खुशी आ जाती थी। हाँ, वही खुशी! जब पिता मेले जाने को राजी हो जाते थे। हाँ, वही मेला! जिसमें खिलौनें और मिठाइयाँ होती थी। हाँ, वही खिलौना, मिठाई ! जिसके लिए हम जिद्द करते थे। हाँ, वही जिद्द! जिसमें मार भी पड़ जाया करती थी। हाँ, वहीं मार! जिसमें हम रोते थे। हाँ, वही रोना! जिसमें माँ दुलार करती थी। हाँ, वही दुलार ! जिसे हम रह  रहकर याद करते हैं...!

प्रेमी

मैं वही ठहरा हुआ हूँ, जहाँ तुम छोड़ कर गए थे।  मैं बग़ीचे में आज भी घंटों तुम्हारी याद में बिता देता हूँ। हाँ, उसी बग़ीचे में जहाँ हमने मिलकर फुलवारी लगाई थी। तुम्हारे जाने के बाद आज भी उस फुलवारी की संभाल करता हूँ ; उन फूलों के रंग के आलावा कोई रंग नहीं बचा है, मेरे जीवन में..! जब तुम आए थे, सबसे मिल कर हर पुरानी याद ताज़ा कर चले गए।  हम जहाँ अक़्सर जाया करते थे, मैं उसी नहर के पास था और तुम अनजान की तरह वहाँ से गुजर गए। तुम साथ थे मैं बहता पानी था, अब थम सा गया हूँ! हाँ, भुला नहीं तुम मर्यादाओं के बहुत पक्के हो.. तुम्हारी मर्यादा पर आँच नहीं आती, अगर तुम उस फुलवारी को छू भर जाते, मैं उससे ही जान लेता तुम्हारा हाल ए दिल और तुम मेरा जान पाते...! हम समुंदर के अलग-अलग टापू से हो गए हैं,  जो रहते है तटस्थ, स्वीकार अपनी प्रकृति। जिनका क़रीब आना संभव नहीं है। कम से कम संतुष्टि इस बात है, कि समुंदर तो एक ही है,  हमा रे लिए इतना काफ़ी है।

कर्म

 भोर हो गई है। हम विश्राम करके उठे हैं। सूर्य की गति से हमारे काज होते हैं, यही हमारी ऊर्जा का स्त्रोत है‌। इसके लिए सदा विनयशील रहिये। जिस प्रकृति प्रदत्त शरीर का  हम भरपूर उपयोग कर रहे हैं,  यह एक अवस्था आने पर  व्याधियों से घिर जायेगा, तब शून्यता का अहसास करायेगा। उस समय हमारी बुद्धि में चलचित्र की भांति  संचित कर्म दिखाई पड़ेंगे ! हम स्वयं को कर्मों के सामने बहुत न्यून पायेंगे ।यही न्यूनता हमें ज्ञात करायेगी  कि कोनसी आकांक्षाएँ साध्य योग्य है , कौनसी नहीं!   अंततः हम संयमित होना सीख जायेंगे।

स्व

गिर गया है! तो उठ जा..। क्या देख रहा है ? कोई हाथ नहीं आयेगा,  खुद ही उठना पड़ेगा..। तुम्हें स्वयं ही वो हाथ बनना पड़ेगा  जिसे पकड़, उठना है। हम स्वयं गुरु भी हैं, शिष्य भी हैं। जब उठ रहे थे, तब गुरु.. गिर रहे थे, तब शिष्य हुये। यह चक्र जीवन में आता रहेगा। जीवन यात्रा है , इसे तय कीजिये..। इस यात्रा में जो मिल जाये, ठीक-ठाक है, कुछ हासिल करना केवल भ्रम मात्र है।  लग रहा होगा यह कोरी कल्पना मात्र है! किंतु ! कल्पना से हम विकसित होते हैं।   ध्यान रहे! कल्पना का अनुपात यथार्थता से अधिक न हो जाये। अगर स्वयं को अतीत से तौलते रहे,  तो जकड़ लिए जाओगे उसके द्वारा! प्राण लगने लगेगा जैसे कोई कर्जा! और तुम पड़ जाओगे जीते जी ठंडे।