मेरे पास उत्तर नहीं
मसिपात्र है,
तुलिका तैयार है।
शब्द आतुर हैं कागज पर उतरने को;
किंतु, मैं भय में हूँ!
शब्द जो चित्र खींचेंगे
उसकी कल्पनामात्र से कांप रहा हूँ।
श्वेत कागज मुझे रक्त रंजित युद्ध भूमि दिखाई दे रहा है।
जो ज्वार मेरे भीतर है,
वह मौन की दीवार से रुका हुआ है;
दीवार कितना भार वहन कर पायेगी और अगर टूटी -
क्या क्या मूल्यवान नष्ट कर जायेगी....मेरे पास उत्तर नहीं।
सुना है- नाश के दुख से कभी दबता नहीं निर्माण का सुख;
मैं नाश के दुख को सहन कर पाऊंगा...मेरे पास
उत्तर नहीं।
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